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Author Topic: इंसान को हवा में उड़ाने वाली मशीन तैयार  (Read 552 times)
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swapnil
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Learning togather


« on: August 06, 2008, 09:24:53 PM »

उड़ना इंसान के  सबसे पुराने और मजेदार सपनों में से एक रहा है। जमीन से धीमे-धीमे ऊपर उठना और अपनी मर्जी की ऊंचाई नापना अब सपना नहीं हकीकत बनने वाला है एक नई जेट पैक मशीन के जरिए।

न्यूजीलैंड के एक इनवेंटर ने इस जेट पैक मशीन को 27 साल की कड़ी मेहनत के बाद तैयार किया है। पिछले दिनों अमेरिका के विस्कॉन्सिन में हुए एक एयर वेंचर शो में इस मशीन का डेमो दिया गया। इसे पहनने के बाद इंसान फिलहाल 30 मिनट तक उड़ सकता है।

इनवेंटर ग्लेन मार्टिन ( 48) ने उम्मीद जताई है कि इस मशीन को अगले साल से एक लाख डॉलर पर पीस के रेट से बेचा जा सकेगा। मशीन के डेमो के दौरान साराक्यूस यूनिवर्सिटी में डाइरेक्टर राबर्ट थामसन ने कहा कि जेट पैक मशीन से जो ख्वाहिश पूरी हो रही है, कोई और चीज उस सपने के करीब भी नहीं आती।

मार्टिन के लिए यह मशीन महज पांच साल की उम्र से देखे जा रहे सपने के सच होने जैसा है। न्यूजीलैंड में डुनेडिन के रहने वाले मार्टिन ने कॉमिक बुक में पढ़ने के बाद इंसान को उड़ाने वाली मशीन के बारे में सोचना शुरू किया।

1960 से लेकर अब तक कई तरह के जेट पैक बन चुके हैं, लेकिन उनमें से कोई भी एक मिनट से ज्यादा की उड़ान भरवाने में सक्षम नहीं हुआ। इन्हें बनाने में कभी प्लास्टिक तो कभी मेटल का इस्तेमाल हुआ।

मार्टिन की मशीन पहली नजर में टिपिकल जेट पैक की तरह नजर भी नहीं आती है। लगभग पांच फीट लंबी इस मशीन में रोटर्स कप केक की शेप के एक कवर में फिट किए गए हैं। रोटर्स किसी भी मोटर के घूमने वाले हिस्से को कहते हैं। गति पैदा करने में इनका प्राइमरी रोल होता है।

मशीन को जमीन पर साधने के लिए तीन पैरों वाला स्टैंड है। मार्टिन की कोशिश इसके फ्यूचर वर्जन को और भी स्लिम और स्मार्ट लुकिंग बनाने की है। गैसोलीन बेस्ड पावर पिस्टन इंजन दो बड़े-बड़े रोटर्स को चलाता है। यह जेट पैक हवा के जोर से उड़ान भरता है।

शुरुआती टेस्टिंग के दौरान मशीन उड़ने को बेताब सी लगी यानी इसे इग्निशन के बाद कंट्रोल करना थोड़ा मुश्किल साबित हुआ। मशीन के साथ उड़ने के अनुभव को बयां करते हुए मार्टिन ने बताया कि कंधों के पीछे 200 हॉर्स पावर का इंजन भयानक शोर करता है। ऐसा लगा जैसे मैं ही खुद को धीमे-धीमे हवा में ऊपर उठा रहा हूं, एक ऐसी मसल के जरिए जिसके बारे में खुद मुझे ही पता नहीं।

अभी तक मार्टिन ने मशीन को 6 फीट से ऊपर नहीं उड़ाया है। डिवेलपर्स की टीम का कहना है कि इससे ज्यादा ऊंचाई पर ले जाने से पहले हम इसके कंट्रोलिंग को फूलप्रूफ बनाना चाहेंगे। टीम का कहना है कि अगर इसे तीन फीट की ऊंचाई पर उड़ाया जा सकता है तो 3 हजार फीट की ऊंचाई पर भी यह काम कर सकती है। फिलहाल मार्टिन का लक्ष्य मशीन को 500 फीट तक की ऊंचाई पर छह महीने के अंदर ले जाने का है। अभी मार्टिन को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि भविष्य में इस मशीन का कैसा इस्तेमाल होगा। उन्हें बस है तो ऊंचा उड़ने की उम्मीद।
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« Reply #1 on: November 15, 2009, 08:35:45 PM »

चंडीगढ़कार का वजन मोटरसाइकिल से भी कम, जो एक लीटर में दौड़ सकती है 160 किलोमीटर। इस कार को तैयार किया है चितकारा इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के विद्यार्थियों ने। 13 विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई ?स्टील्थ सुपर माइलेज? कार कैलिफोर्निया में 15 से 18 अप्रैल तक शेल इको मैराथन में हिस्सा लेगी।

चितकारा के विद्यार्थियों ने इंडस्ट्रियल एरिया फेज-2 में किराए पर जगह लेकर अगस्त 2008 में इस कार पर काम शुरू किया। एक सीटर, तीन टायरों वाली इस कार के लिए 150 सीसी मोटरसाइकिल के इंजन को 125 सीसी का बनाया गया।

इंजन का सिलेंडर और पिस्टन छोटा करने के साथ ही सिलेंडर का डायामीटर भी छोटा किया गया। कार का वजन हल्का रखने के लिए फाइबर की बॉडी और एल्यूमिनियम की चेसी बनाई गई। इससे कार का वजन 90 किलो तक आ गया।

हवा का दबाव कम से कम करने के लिए कार को एयरोडायनेमिक शेप दी गई। इसके बाद शहर की विभिन्न सड़कों पर इस कार की टेस्टिंग की गई। नतीजा आया एक लीटर पेट्रोल में 160 किलोमीटर की माइलेज। चितकारा के विद्यार्थी सिद्धार्थ के मुताबिक, स्टील्थ को बनाने में 1.55 लाख रुपए का खर्च आया।

यह खर्च चितकारा कॉलेज और भारत पेट्रोलियम ने मिलकर उठाया। यह कार सोमवार को दिल्ली से हवाई जहाज के जरिए कैलिफोर्निया पहुंचेगी। चितकारा के विद्यार्थियों का समूह 9 अप्रैल को रवाना होगा। चितकारा यूनिवर्सिटी के चांसलर अशोक चितकारा कहते हैं, हमने विद्यार्थियों को पूरा सहयोग दिया।

कैलिफोर्निया में सिर्फ हम ही देश का प्रतिनिधित्व करेंगे।

1939 में हुई मैराथन की शुरुआत:

जर्मनी में कारों के इंजन पर कई प्रयोगों के बाद 1939 में शेल इको मैराथन की शुरुआत हुई। बाद में इंग्लैंड और अमेरिका में भी कंपीटिशन शुरू हो गए। मैराथन का मकसद ऐसे ऑटोमोबाइल इंजीनियर तैयार करना है, जो बेहतरीन माइलेज की कार तैयार कर सकें।

कैलिफोर्निया में कार में 250 एमएल पेट्रोल डालकर इसे ट्रैक पर दौड़ाया जाएगा, फिर एक लीटर के हिसाब से अनुपात निकाला जाएगा। कंपीटीशन में कारों को डिजाइन, टेक्निकल इनोवेशन, कॉस्ट एंड मार्केटिंग, सेफ्टी, इकोफ्रेंडली पैमाने पर परखा जाएगा।

स्टील्थ की टीम:

?स्टील्थ सुपर माइलेज? को तैयार किया है, सिद्धार्थ बहूजा, अंकित खुराना, समक्ष चड्ढा, अमित, मनीष, अभिमन्यु, आयुष, राघव, अनिरुद्ध, साहिल, जुबिन, जसकरण और कुलजीत सिंह ने।

यह सभी मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग के विद्यार्थी हैं। इन विद्यार्थियों का कहना है कि कार के जरिए उनका सपना आसमान छूने का है। इसीलिए कार को नीला रंग दिया है।
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